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गौ सेवकों को अपमानित नहीं, सम्मानित करने की आवश्यकता क्यों

गौ सेवकों को अपमानित नहीं, सम्मानित करने की आवश्यकता क्यों

गौ सेवक, ऐसा व्यक्ति जो गऊ माता की सेवा करता है, उसका सम्मान होना अत्यंत आवश्यक है। आज के समाज में गौ सेवक को अक्सर अपमानित किया जाता है, लेकिन क्या यह सही है। गौ सेवक न केवल गोवंश की रक्षा करते हैं, बल्कि वे हमारे पारंपरिक मूल्यों और संस्कृति का भी संरक्षण करते हैं। गौ सेवक का कार्य सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि उससे कहीं बढ़कर आज के समय में एक ऐसी सेवाभाव है जो हमारे समाज के मूल्यों, सिद्धांतों और आदर्शों को भी बनाए रखती है। जब हम गौ सेवक को सम्मान देते हैं, तो हम उनके इन उत्कृष्ट कार्यों की सराहना भी करते हैं। जो उनके साथ साथ उन सभी के उत्साह को बढ़ाता है जो समाज के प्रति अपने इन सभी वास्तविक और पारंपरिक जिम्मेदारियों को आज भी समझते हैं।  

हमें यह समझना होगा कि गौ सेवकों का अपमान वास्तव में हमारे समाज के वास्तविक मूल्यों और आदर्शों का भी अपमान करना है। हम गौ सेवक से प्रेरित नहीं होते हुए और उल्टे अगर उनका अपमान करते हैं तो यह बात अपनी स्वयं की संस्कृति की नींव को कमजोर करने के बराबर है। आइए, हम यह बात और अच्छी तरह से जानने की कोशिश करते हैं कि गौ सेवकों का सम्मान क्यों आवश्यक है। गौ सेवकों को अपमानित नहीं सम्मानित करने की आवश्यकता क्यों है।

भारत को ऋषि-मुनियों का देश कहा जाता है। न सिर्फ आज का भारत बल्कि जब जब और जहां जहां दुनिया में सनातन का बोलबाला रहा तब तब किसी भी व्यक्ति के माता से भी बढ़कर गऊ माता को माना गया है। यानि गाय को सनातनी मान्यतानुसार मानव के सगी माता से भी बढ़कर गऊ माता की संज्ञा दी गई है।

मान्यता है कि गाय के शरीर में समस्त देवी-देवताओं का वास होता है इसलिए सनातन में सगी माता से भी बढ़कर गऊ माता की महिमा बताई गई है। अतः गौ सेवक गऊ को बचाने के लिए मानव को धरने, पकड़ने, मारने और सजा देने का प्रयास नहीं कर रहे, बल्कि वे मानव के लिए उन गऊ माता को बचाने के प्रयास में लगे हैं जिनमें समस्त देवी-देवताओं का निवास स्थान माना जाता है।

जो हजारों वर्षो से मानव के समस्त प्रकृति को बचाने वाली और स्वयं अपने दूध, गोबर और गोमेज से मानव और उनकी प्रकृति का भरण-पोषण करने वाली तथा उन्हें स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने वाली है। जिस वजह से ऋग्वेद और सामवेद में गऊ माता को अघन्या कहा गया है। अघन्या, यानि जिसका वध नहीं किया जा सकता।

फिर भी जो लोग इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं और गोवध, गोकशी करने वालों की सहायता कर रहे हैं या गऊ माता को कत्लखाने तक पहुंचा कर इन सभी बातों की अनदेखी कर रहे हैं। ये गऊ सेवक बस उन्हीं कुछ लोगों के विरूद्ध दिखते हैं, जो केवल पैसे के लिए इतना जघन्य अधर्म और अपराध भी कर रहे हैं।

गाय के बारे में अच्छी मान्यता को आज भी बल मिलता है तो ऐसा इसलिए कि इस वैज्ञानिक युग में भी गाय के बारे में सनातनी मान्यताओं को नकारे जाने का कोई एक भी प्रमाण नहीं मिल पाया है। गऊ माता की सेवा करने और गौ आधारित कृषि के महत्व की बातों को आज का विज्ञान भी अर्थव्यवस्था के सबसे बेहतर विकल्प के तौर पर देखता है। क्योंकि गौमाता की सेवा और गौ आधारित कृषि की अर्थव्यवस्था मानव को आत्मनिर्भरता प्रदान करने के साथ साथ मानव को उसके मूल प्रकृति के साथ जोड़ती है।

गौमाता की सेवा के साथ साथ गौ आधारित कृषि की अर्थव्यवस्था, मानव के साथ पूरे प्रकृति की कल्याण करने की एक समुचित व्यवस्था है। जब भारत में स्वर्णकाल था और जब भारत को सोने की चिड़िया कहा गया तब उस भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे प्रमुख आधार भी मात्र एक गौ आधारित कृषि व्यवस्था हीं थी।

मगर जब भारत में स्वर्णकाल के पश्चात बाद में फिर अंधकार युग का भी प्रभाव रहा तब हम केवल सुनी सुनाई बातों के आधार पर भी अपनी पारंपारिक मान्यताओं को छोड़कर नई नई बेबुनियाद बातों से भी, पहले अपनी मान्यताओं और फिर अपने कर्मों को भी एक गलत दिशा देने लगे। जिससे सनातनी मान्यताओं में कई खूबियां होने के बावजूद हम सनातनी भी एक तरह से अंधकार युग में हीं अपना जीवन जीने का अभ्यस्त होते चले गए।

अंधकार युग के बाद भौगोलिक खोजों के कारण दुनिया के लगभग देशों के लोगों को एक दूसरे की आपसी जानकारी की स्वीकारोक्ति की बात भी अच्छी लगने लगी। परिणामस्वरूप एशिया और विशेषकर पश्चिम के लोगों की सभ्यता-संस्कृति का भी और ज्यादा आपसी मेल-जोल या भाईचारा भी विशेष बढ़ने लगा। जिसके दुष्परिणामस्वरूप एशिया समेत विशेषकर यूरोप की अनेक सभ्यताओं के मेल-जोल से उत्पन्न भाईचारे का दुष्प्रभाव भी बढ़ने लगा।

हालांकि अंधकार युग के बाद दुनिया के विकासशील और कई विकसित देशों की तरह भारत में भी आज के इस वैज्ञानिक युग में भी सनातनी मान्यताओं को फिर से बल मिलने लगी है। क्योंकि सनातन की लगभग सभी मान्यताएं वैज्ञानिक आधार हीं लिए हुए हैं। ऐसे में आज के वैज्ञानिक युग की बात करने वाले इस युग में हम सनातन को एक धर्म या सम्प्रदाय के अलावां एक उत्कृष्ट विज्ञान की संज्ञा भी दें तो यह कोई अतिशयोक्ति वाली बात नहीं होगी।

स्पष्ट है कि आज वैश्वीकरण के अंधी दौड़ में हम सभी मानव का जीवन इस तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है जिसका दुष्परिणाम भी अंततः हम सभी मानव को हीं भुगतना पड़ रहा है।

विडंबना यह है कि सनातनी मान्यतानुसार गाय के महत्व को समझते हुए कुछ गौ सेवकों द्वारा जहां जहां और जब जब गऊ को बचाने का प्रयास किया जाता है, कि किसी भी तरह से गऊ माता का जीवन और नस्ल बचाया जा सके। उन्हें बीमार और जिंदा रहते कत्लखाने जाने से बचाया जा सके। गोवध, गोकशी को रोका जा सके। तो उल्टे उन्हें बचाने का प्रयास करने वाले गौ सेवकों को हीं दोषी ठहराए जाने की बात भी की जाने लगती है।

जिस बात को अंधकार युग के बाद से कई संस्कृतियों और सभ्यताओं के आपसी मेल-जोल के एक और अति भयंकर दुष्प्रभाव के रूप में भी हम देख सकते हैं। आज जिस तरह से गाय को मारकर अर्थव्यवस्था की मजबूती की बात की जाती है। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए इस तरह की स्वीकारोक्ति को समझने की भी आवश्कता है कि आखिर इस तरह की स्वीकारोक्ति की स्वीकार्यता लगातार बढ़ते रहने के और मायने भी क्या हैं। हम कहां से चले थे और अब किस दिशा में जा रहे हैं..।  

इन सभी बातों की जड़ में जाने से यह ज्ञात होता है कि पश्चिम की सभ्यता-संस्कृति विशेषकर भौतिकतावाद पर हीं आधारित बात करती है। पश्चिम की सभ्यता-संस्कृति मानव की बात के साथ मानव के लिए इस तरह से भौतिकतावाद की बात करती है जैसे पूरी दुनिया केवल एक भौतिकतावाद पर आधारित मात्र एक बाजार ही हो और दुनिया के सभी लोग केवल एक उपभोक्ता मात्र हीं हों।  

जबकि सनातन एक ऐसे विश्वास की परम्परा है जिसकी जड़ में यह पूरी प्रकृति और श्रृष्टि का कल्याण करना भी है। सनातन मान्यतानुसार समस्त जीवों का कल्याण हीं मानव जीवन का सबसे प्रमुख कर्तव्य और आधार है। आज का विज्ञान भी इस बात से इंकार नहीं करता वह भी यह मानता है कि प्रकृति को बनाए रखने के बिना मानव जीवन को भी बचाया जाना संभव नहीं है।

जबकि इसी बात के महत्व को समझते हुए सनातन मान्यतानुसार प्रकृति में मौजूद सभी प्राणियों के महत्व को उचित स्थान देने की कोशिश में आज से हजारों वर्ष पूर्व सफलता भी हासिल की गई। उसी सफलता के फलस्वरुप गऊ माता की सेवा के महत्व को समझने के साथ साथ गौ आधारित कृषि व्यवस्था को भी अपनाया गया।

गऊ सेवा और गौ आधारित कृषि व्यवस्था का जन्म भारत और विशेषकर सनातनी मान्यता के उन विचारों की बात है जिनमें आध्यात्म के साथ साथ भौतिकतावाद को भी उचित स्थान देने तथा विशेषकर मानव द्वारा अपनी समस्त प्रकृति को बनाए रखने की भी समुचित बात है।

ऐसे में गौ सेवकों को अपमानित नहीं सम्मानित करने की आवश्यकता क्यों है, इस बात को हम स्वयं समझ सकते हैं। आइए, हम सभी मिलकर गौ सेवकों का सम्मान करें और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का शपथ लें।

क्योंकि जब हम उन्हें सम्मानित करते हैं, तो हम अपने समाज को एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने का भी कार्य करते हैं। हम सनातन के सभी मूल्यों, आदर्शों और परंपराओं के महत्व को समझते हुए उन्हें बनाए रखने का भी कार्य करते हैं।    

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